पाप या पुण्य क्या है / पाप या पुण्य का काम कोई नहीं करता , बल्कि अपने आप होता है /What is sin or virtue /Nobody does sin or virtuous action, but it happens on its own

पाप और पुण्य हमारे मन का भाव है जिस प्रकार देव कर्म और दानव कर्म होते हैं या जिस प्रकार से सुख दुख का अनुभव हम लोगों को होता है । यह सब मन का भाव है । पाप और पुण्य का सरल परिभाषा है कि जो काम हम खुलेआम करते हैं वह पुण्य कर्म है और जो काम हम छिप कर करते हैं वह पाप कर्म है ।

लेकिन पाप या पुण्य का कर्म कोई करता नहीं , वह अपने आप होता है ।इसे आप समझने का प्रयास करें कोई भी व्यक्ति पाप कर्म नहीं करता । जैसे चोर चोरी नहीं करता । वह अपने आप होता है। अपराधी हत्या या रेप नहीं करता । वह होता है । इसको आप समझें कि आपका दिमाग ऑटोमेटिक है वह आपसे काम करवाता है और आप काम करते हैं । जैसे क्रोध या गुस्सा आपको आता है । यह क्रोध या गुस्सा अपने आप आता है । आप क्रोध या गुस्सा करते नहीं । क्रोध या गुस्सा आपके बस में नहीं था । अगर बस में होता तो आप क्रोध या गुस्सा नहीं करते । कोई हत्या नहीं करता । ऐसा क्यों होता है ?

जब तक आपकी आत्मा सोई हुई है , मूर्छित है । अगर चित्त की दशा मूर्छित है , चेतना सोई है । ऐसे व्यक्ति जो भी काम करेगा वह पाप ही करेगा । ऐसे व्यक्ति को आप गाली दो तो बदले में वह भी आपको गाली से जवाब देगा । यह भी हो सकता है कि वह आपके ऊपर हाथ भी छोड़ दे । अगर उसके बस में होता तो उसे रोक सकता था । गाली देने से बच सकता था । पर ऐसा नहीं होता । उसके बस में नहीं था । उसको सामने वाला गाली दिया तो बदलें में उसने भी उसको गाली दिया । कोई सोच विचार करके किसी को गाली नहीं देता है । यह अपने आप होता है। इसे कोई करता नहीं । करना या होना , दोनों के बीच जमीन आसमान की दूरी है । यह अपने आप होता हैं जब भी चित की दशा मूर्छित हो या आत्मा सोई हो ऐसे व्यक्ति जो भी काम करेगा वह पाप ही काम करेगा । भले ही वह हजारों लोगों को खाना खिलाता हो, दान करता हो , मंदिर मस्जिद बनवाया हो। आपको दिखने में लगेगा कि वह अच्छा काम करता है पर उसका पाप का बाप उसके अंदर ही छुपा रहता है। यस का , नाम का , धन दौलत का पाप उसके अंदर छिपा होता है । यह मंदिर मस्जिद के दीवारों पर उसका नाम लिखा आपको देखने को मिल जाएगा । अखबारों में , टेलीविजन पर उसका नाम आपको दिख जाएगा ।
ठीक इसी प्रकार कोई भी व्यक्ति जैसे संत महात्मा पुण्य का काम नहीं करता उससे पुण्य का काम अपने आप होता हैं । कोई करता नहीं । सुकरात को जहर दिया गया । उसने हंसते हंसते स्वीकार किया । उसके बदले में उसने जवाब नहीं दिया । जीसस को सूली पर चढ़ा दिया गया । उनसे अंतिम इच्छा पूछी गई । उसने कहा , हे परमात्मा इन्हें क्षमा कर दें ।इन्हें यह पता नहीं, यह क्या काम कर रहे हैं । जिसकी चित्त की दशा अमूर्छित हो , चेतना जागृत हो , ऐसे व्यक्ति से जो भी काम होगा , वह पुण्य का काम ही होगा । उनसे ऐसे ही कार्य अपने आप होते हैं । उसके लिए उन्हें को सोचना विचारना नहीं पड़ता । आपने सुना होगा यूनान का गुरजिएप नाम का एक फकीर था उसे बाजार में पकड़ कर हजारों गालियां दी गई । पर उसने गाली का जवाब नहीं दिया।उसने कहा इसका जवाब मैं कल दूंगा । उन लोगों ने कहा मैं अभी आपको गाली देता हूं आप कल जवाब देंगे इसका क्या मतलब हुआ । उसने कहा अगर जरूरत हुई तो इसका जवाब दूंगा । अगर जरूरत नहीं हुई तो इसका जवाब नहीं दूंगा ।

या आप महावीर के जीवन को देखें तो आपको बहुत कुछ समझ में आने लगेगा । महावीर को पत्थरों से मारा गया फिर भी उसने पत्थरों का जवाब नहीं दिया । बुद्ध करुणा के पुजारी थे । उनके कर्म से करुणा बहा करती थी । ऐसे लोगों की आत्माएं जागृत होती है । जिन लोगों का चित अमूर्छित होता है । उनसे ऐसे कर्म अपने आप होते हैं । उन्हें करना नहीं पड़ता ।
आप जानते होंगे कि महात्मा गांधी जी ने एक बार एक गाय के बछड़े को जहर दिया ।आपको लगता होगा कि उसने पाप किया । गाय के बछड़े को मारने का पाप गांधी को लगा , लेकिन आप उनके अंतर्मन में झाकर देखे तो आपको पता चलेगा कि वह बछड़ा बहुत तकलीफ में था। उसे बचाए जाना मुश्किल था। गांधी जी के बस में नहीं था कि बछड़े को बचा सके । इसलिए उसने बछड़े को जहर दिया ताकि उसकी तकलीफ कम हो जाए । अब आप इसे क्या कहेंगे कि गांधी जी ने पाप किया । आपको दिखने में लगेगा कि गांधी जी ने पाप कर्म किया । लेकिन वह पुण्य कर्म था। आत्मा की जागृत अवस्था में किया गया कोई भी कर्म पुण्य कर्म ही होता है ।
आत्मा की जागृत अवस्था में ऐसे कार्य होता है , कोई करता नहीं। चित्त की दशा जागृत हो तो ऐसे कर्म अपने आप होते हैं । इसे करना नहीं पड़ता । जिस व्यक्ति का चित जागृत अवस्था में होता है । वह चाहे जो भी काम करेगा , वह पुण्य कर्म ही करेगा ।

अगर आप इसे बदलना चाहे तो आप ऊपर लेवल से कभी नहीं बदल सकते हैं । आपको बहुत गहरे में जाना होगा। आत्मा के लेवल पर जाना होगा तो ही आप पाप को पुण्य में बदल सकते हैं । जैसे आपने आम का पेड़ लगाया तो आपको आम का फल ही मिलेगा , सेव का नहीं ।आप चाहे कितना भी उस पेड़ का सेवा करें । उस पेड़ से आपको आम ही मिलेगा , सेव नहीं । सेव के लिए आपको बहुत गहरे में जाना होगा । बीच के रूप में जाना होगा । सेब का बीज आपको लगाना होगा तभी आपको सेव का फल मिलेगा। कोई भी महान कार्य आत्मा की जागृत अवस्था में होती है चित्त की अमूर्छित अवस्था में ही पूरा होता है ।
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