मंसूर हल्लाज कौन है? मंसूर हल्लाज की कहानी क्या है? सत्य और प्रेम के लिया मंसूर ने क्या किया? चलिए मंसूर के विषय में जानते हैं। मंसूर की पैदाइश की तारीख प्राचीन किताबों में कोई उल्लेख नहीं है । यह कहानी सूफी मंसूर अल हल्लाज की है
मैसूर हल्लाज के गुरु थे जिनका नाम था जुन्नैद । मंसूर ने आत्मज्ञान की शिक्षा जुन्नैद से ली थी मंसूर को एक समाज सुधारक और मुक्तिदाता के रूप में जाना जाता है । उनके बारे में यहां तक कहा जाता है कि वो जहां भी जाते बड़ी संख्या में लोग उनके अनुयाई हो जाते थे।
उन्होंने अपने जीवन और अपनी मौत से दुनिया में बड़ी हलचल पैदा कर दी थी। आज शताब्दियों का समय गुजर जाने के बावजूद अब भी ईरानी और पश्चिमी शोधकर्ताओं उनके के बारे में लिखा करते हैं। ईश्वर में लीन रहने वाले मंसूर ने बड़ी संख्या में ईरान भारत तुर्किस्तान और चीन जैसे देशों के लोगों को प्रभावित किया।
जिस समय मंसूर को आत्मज्ञान हुआ उस समय उनके मुंह से निकला ‘ अनहलक ‘ शब्द। अनहलक का अर्थ होता है ,’ मैं खुदा हूं ‘ । जिसके कारण उस वक्त के शासक और धर्म शास्त्रियों को अपनी अपनी सत्ता का भय होने लगा जिसके कारण मंसूर को ईश्वर निंदा के जुर्म में उनको जेल में डाल दिया।
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कहा जाता है कि मंसूर को जेल में लगभग 11 साल तक यातनाएं दी गई उसके बाद उन्हें मौत का निर्णय सुनाया गया । मंसूर अपने जीवन में कभी भी अपने विरोधियों और दुश्मनों की ओर से दी जाने वाली पीड़ाओ से भयभीत नहीं हुए । जिन लोगों ने उनके खिलाफ मौत का आदेश दिया था। उन्होंने उन सब को माफ कर दिया था।
खलीफा के आदेशानुसार लोगों की भीड़ ने मंसूर को पत्थर मार रही थी। तब भी मंसूर हंस रहा था तभी अचानक किसी ने उसे फूल फेंक कर मारा यह देख मंसूर रोने लगा।
फूल फेंकने वाला कोई और नहीं था बल्कि मंसूर का अपना गुरु जुन्नैद था । जुनैद ने मंसूर से पूछा , तूम मेरे फूल फेंकने से रोए क्यों ? मंसूर ने कहा कि लोग मुझे पत्थर मार रहे हैं। मैं समझता हूं कि उन्हें ईश्वर का पता नहीं । वह निर्दोष है । लेकिन आप तो ईश्वर को जानते हो । क्यों आप लोगों के नजरों में दिखावा कर रहे हो ? आपने मुझे सिखाया था कि कभी भी दिखावा और पाखंड में जीना नहीं । आपने फूल फेंक कर मेरा दिल तोड़ दिया ।
आप जानते है कि ओशो रजनीश ने अपने प्रवचन में सुनाया था जिस तरह से मंसूर को मारा गया था उनकी हत्या की गई थी। इतने क्रूर तरीके से हत्या की गई थी। इतना कष्ट दिया गया था उतना कष्ट जीसस ( यीशु ) को भी नहीं दिया गया था।
पहले मंसूर के दोनों पांव काटे गए फिर, उसके बाद उनको दोनों हाथ काट दी गई, फिर दोनों आंखें फोड़ दी गई फिर भी मंजूर हंसता रहा ईश्वर के नाम पर , खुदा के नाम पर अपने आप को कुर्बान कर दिया।
मंसूर ने अपने जीवन के आखिरी समय तक कभी भी सत्य और प्रेम का साथ नहीं छोड़ा। भले ही उन्हें अपने आपको कुर्बान करना पड़ा तो उन्होंने अपने आप को कुर्बान कर दिया । पर सत्य और प्रेम का साथ नहीं छोड़ा।
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